तकनीक और गुजराती पत्रकारिताः बदल रहे हैं हम यहाँ

टेलिविज़न पर धूम मचानेवाली हास्य धारावाहिक तारक मेहता का उल्टा चश्मा में एक पात्र है, मास्टर भीड़े का। पेशे से शिक्षक भीड़े मास्टर की एक खासियत है, ये महाशय किसी भी बात पे फ्लेशबैक में चले जाते हैं और “हमारे ज़माने में…” से शुरु कर के अपने बीते हुए कल की कहानी सुनाने लग जाते हैं। लगभग वैसे ही हम जैसे पिछले दशक में जर्नलिज़्म में आये युवा पत्रकारों को अपने अपने सिनियर्स द्वारा ऐसी पुराने ज़मानेवाली बातें सुनने का मौका अमूमन मिलता ही रहता है। आज के जैसी टैक्नोलोजी की गैरहाज़री में कैसे वे पैज डिझाइन करते थे, कैसे पैज के किसी कोने में तीन-चार लाईन की जगह खाली पड़ जाये तो क्या ड़ालना पड़ता था, कैसे उस ज़माने के एडिटर्स दो ख़बरों के बीच में पड़ी जगह को ऊंगलियों से नाप के अपनी दुनिया देख चूकी आँखों से एक्झेक्ट ज़रूरत के मुताबिक ही शब्द निकालते थे, कैसे टेलिप्रिन्टर न्यूज़ एजेन्सियों के ताज़ातरीन समाचार बैन्क के एटीएम की तरह उगलते रहते थे, कैसे गैली बनती थी, पैपर प्रेस में जाने के बाद प्लैट्स बनती थी… ये सारी बातें आज के युवा पत्रकारों को किसी प्राचीन युग की दंतकथा जैसा प्रतीत कराती है। कभी कभार तो ख्वामख्वाह उन्हें उपहास का सामना भी करना पड़ता है कि, “उन दिनों आज के जैसा गूगल नहीं था, कि झट से एक क्लिक किया और सारी ईन्फर्मेशन अलादीन के जिन्न की तरह हाज़िर। अरे, एक ढंग की ईमैज ढूंढ़ने के लिये हमें कितनी पुरानी मैगज़िन्स के सैंकड़ों पन्ने पलटने पड़ते थे उनका तो तुम्हें अंदाज़ा भी नहीं लग सकता।”

दरअसल बात ये है कि गुटैनबर्ग के ज़माने से ले कर आज के झकरबर्ग के ज़माने तक, टैक्नोलोजी पत्रकारिता से सियामिज़ ट्विन्स की तरह ज़ुडी हई रही है। अहमदाबाद हो या लंड़न की फ्लीट स्ट्रीट, हर विभिन्न क्षेत्रों की तरह, पत्रकारिता में भी टैक्नोलोजी साथ साथ ही चलती रहती है। एक युग था जब गुजरात के दिग्गज पत्रकार अमृतलाल शेठ घोड़े पर सवार हो के रिपोर्टिंग के लिये निकलते थे तब उनके हाथ में कागज़ और कलम के साथ एक भरी हुई राइफल भी रहती थी, क्योंकि बहारवटिये कहलाने वाले काऊबाॅय टाइप के लूटेरों से खुद की रक्षा भी करनी थी। तो मेरे हिसाब से ये भी उनकी टैक्नोलोजी का ही एक पहलु था। लेकिन आज जब पत्रकार के पाॅकेट में थ्रीजी टैक्नोलोजी से लैस स्मार्टफोन खनकते रहते हैं, व्होट्स ऐप से अपने एडिटर से बतियाते है, तो ये आज की टैक्नोलोजी का ही मुज़ायरा है।

मिट गई दूरियाँ

बहोत ज़्यादा फ्लैशबैक में न जा कर कुछ साल पहले का ज़माना याद करें तो पता चल जाता है कि कैसे रिपोर्टर अपनी अपनी बीट के ईलाके में जा कर स्टोरी निकालते थे, अपने राईटिंग पैड पे प्वाईन्ट लिखते थे और फिर शाम को प्रैस पे आ कर ऊस पूरे वाक्ये को खबर का रूप देने के लिये लिखते थे। आज ‘दिव्य भास्कर‘ का ही उदाहरण ले लिजिये, तो उन्होंने अपने पत्रकारों को ब्रौड़बैन्ड ईन्टरनेट से लैस छोटे लैपटोप दे रख्खे है। जिस की मदद से रिपोर्टर फिल्ड में कहीं भी हो, वहाँ से वे अपनी स्टौरी फाईल कर सकते है। ईसी तरह फोटोग्राफर भी फिल्ड से किसी घटना के फोटोग्राफ फाईल कर सकते है। इससे तीन प्रमुख फायदे हुए। एक, खबर की गति तेज़ हुई। दो, ऑफिस में बैठे एडिटर को किसी घटना की लेटेस्ट अपडेट मिलने लगी (जिससे वे अपने रिपोर्टर को ओन गोइंग घटना को किसी खास एंगल से कवर करने की भी सूचना देने की स्थिति में आ गये)। और तीन, पत्रकार के लिये ज्योग्राफिकल मर्यादायें कम हो गई, मानो खत्म ही हो गई। आज गुजरात में कई जुज़ारु पत्रकार ऐसे भी है जो काफी दिनों तक ऑफिस का मूँह नहीं देखते, लेकिन उनकी फाईल की गई स्टोरीज़ को देखकर एडिटर को यह ढाढस रहती है कि चलो, बंदा मैदान पे बड़ी मुश्तैदी के साथ डटा हुआ है। आज का गुजराती रिपोर्टर अखबार के साथ साथ अपने अखबार की न्यूज़ वैबसाइट को भी अपनी खबर पहूंचाता है, लेकिन वैबसाइट के बारे में हम आगे बात करेंगे। अपनी स्टोरिज़ फाईल करने के लिये रिपोर्टर को मैट्रिक्स जैसे सर्वरनुमा प्रोग्राम में लोग ईन कर के अपनी स्टोरी उसमें ड़ालनी पड़ती है। जैसे ही स्टोरी मैट्रिक्स के पास पहूंची, उसी वक्त वह स्टोरी उनके एडिटर कहीं से भी पढ़ सकते है, और उस पर काम भी चल पड़ता है।

डिज़ाईन की दिलकशी

भारत और विश्व की दुसरी भाषाओं की तरह गुजराती में भी प्रिन्ट मीडियम को टेलिविज़न और ईन्टरनेट जैसे ज़्यादा सक्रिय और तेज़ माध्यमों से कड़ी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। अगर मलैशिया का कोई विमान ग़ायब हो जाता है तो अखबार में वह खबर दुसरे दिन छपने तक तो वह बासी हो चुकी होती है। अखबार अगर ईन्टरनेट पे उपलब्ध इन्फर्मेशन के अलावा कुछ नया न दें तो पाठकों को, खास कर युवा पाठकों को उस खबर में ज़रा भी दिलचस्पी नहीं रहती। इसी जगह ले आउट की भूमिका अहम हो जाती है। फैब्लेट और टैब्लेट के बढ़ते चलन में भी यह बात निकल कर आई है कि रिडर्स अखबार, मैगज़िन और किताबों के ई वर्ज़न पढ़ना पसंद करते है, क्योंकि उस में ले आउट की वजह से कागज़ पे छपीं ख़बर जैसी ही फील आती है। प्रिन्ट मीडियम में दुसरे दिन छपी खबर को बासी होने से बचाता है दिलकश ले आउट। सफाई से छपीं तसवीरें, ईन्फोग्राफिक्स वगैरह उसी खबर को एक नया रूप दे देता है।

ले आउट के लिये एक समय जहाँ एडोबी (जिसे प्यार से ‘एडोब’ कहा जाता है) कंपनी का पैजमैकर सोफ्टवेयर इस्तमाल होता था, आज ज़्यादातर ओर्गेनाइज़ेशन्स में ‘क्वॉर्क एक्सप्रैस’ चलता है। एडोबी फोटोशोप और कॉरल ड्रो में सजी सँवरी इमैजिस जब क्वार्क के पैज पे चड़कर लेआउट की शक्ल में ढलती है तब वह किसी अखबार या मैगज़िन को अपनी आइडेन्टिटी प्रदान करता है। अच्छे ले आउट के लिए पज़ेसिव ‘दिव्य भास्कर’ ने बाकी ऑर्गोनाइज़ेशन्स से एक कदम आगे निकलकर एडोबी का नया सोफ्टवेयर ‘ईन डिज़ाइन’ इस्तेमाल करना शुरु कर दिया है।

इसी दिव्य भास्कर का लैटेस्ट टेक्नोलोजिकल कदम है वर्च्यूअल डेस्कटोप इन्फ्रास्ट्रक्चर। इसमें सभी कम्प्यूटरों को एक कोमन सर्वर से जोड़ दिया है और कोई भी कर्मचारी अपने आईडी से संस्था के किसी भी कम्प्युटर पे अपने डैटा का इस्तेमाल कर सकता है।

फॉन्ट की फाईट

कई बार मैं मज़ाक में कहता हूँ कि विश्व में जितने धर्म हैं, उतने ही शायद हमारे यहां विभिन्न भाषाओं में लिखने के लिये फोन्ट्स चलते है। कोई ‘भाषाभारती’ इस्तेमाल करता है तो कोई ‘ईन्डिका’ की शरण में है। लेकिन जैसे इंग्लिश में फोन्ट्स की कोई समस्या नहीं होती, इसी तरह गुजराती में भी आनेवाला कल ईन्टरनेट फ्रेन्ड्ली ‘युनिकोड’ का है। ‘दिव्य भास्कर’ और ‘टाईम्स ऑफ इन्डिया’ ग्रूप के नये अखबार ‘नव गुजरात समय’ ने तो युनिकोड फोन्ट का प्रयोग जोरशोर से शुरु कर ही दिया है।

स्मार्ट फोन की जनमघुट्टी पी कर पली-बडी नई पीढी जब जर्नलिज़्म में आती है तो उनके लिये कम्प्युटर पर टाईप करना बेहद सहज रहता है, लेकिन गुजराती पत्रकारिता में आज भी ऐसे कई सिनियर पत्रकार-तंत्री महोदय-लेखक है, जिनकी कलम जब तक कागज़ को छूती नहीं, उनके विचारों की सर्किट पूरी नहीं होती।

टैक्नोलोजी की दुनिया के नये बाशिंदेः वैबसाइट और न्यूझ चैनल्स

नये ज़माने के साथ कदम मिलाती हुई गुजराती पत्रकारिता में लगभग सभी प्रमुख अखबार की अपनी न्यूझ वैबसाइट है। इतना ही नहीं, पूरी दुनिया में फैले अपने पाठको कों पल पल की खबर देने के लिये वे वैबसाइट के लिये अलग फौज भी तैनात की हुई है। धीरे धीरे हर समाचार समूह अपनी अपनी मोबाइल एप्लिकेशन भी ला रहा है, जिससे स्मार्टफोन व टैब्लेट से भी ब्रेकिंग न्यूज़ मुहैया हो रहे है। लेकिन दुख की बात है कि अच्छा रीडिंग मटिरियल देने के बजाय ज्यादातर वैबसाइट्स का ध्यान अपनी साइट के लिए ज्यादा से ज्यादा हिट्स पाने पर ही केन्द्रित है, क्योंकि इसका सीधा कनेक्शन एडवर्टाइज़मेन्ट रेवेन्यू के साथ जुडा हुआ है। इसलिये पाठकों देखते ही क्लिक करने के लिए उत्सुक हो जाए ऐसे भड़कीले हैडिंग, अश्लील तसवीरें और जन्क समाचारों की भरमार रहती है।

चौबीस घंटो की गुजराती न्यूज चैनल्स का इतिहास भी एक दशक से कम का ही है। लेकिन इसने समय में आज लगभग उतनी ही न्यूज चैनल्स चल रही है, जो टैक्नोलोजी के मामले में किसी भी नेशनल न्यूज़ चैनल से पीछे नहीं है। इन चैनल्स के रिपोर्टर बड़ी शान से अपनी चैनल की गाड़ी में रिपोर्टिंग के लिये निकलते हैं और चैनल के लोगोवाला बूम लेकर ‘पीटुसी’ (पीस टु कैमरा) देते रहते है। लेकिन एक आध को छोड़कर किसी भी चैनल के पास अपनी आउटडॉर ब्रोडकास्टिंग वैन नहीं है। लाईव टेलिकास्ट के लिये बाकी की चैनल्स छोटी सी लाईव किट से काम चलाती हैं। सभी प्रमुख गुजराती न्यूज़ चैनल्स ईन्टरनेट पे लाइव देखी जा सकती है।  टैलिकास्ट के मामले में आगे होने के बावजूद उनका प्रोग्रामिंग और न्यूज़ प्रेज़न्टेशन शोर मचानेवाली हिन्दी चैनल्स से अलग नहीं है।

सिटीज़न जर्नलिज़्म

हर हाथ में स्मार्टफोन आ जाने का फायदा गुजराती जर्नलिज़्म बखूबी ले रहा है। लगभग सभी प्रमुख अखबार, चैनल और वेबसाइट ने अपने अपने व्होट्स ऐप नंबर क्रियेट किए है, जिन पर दर्शक-पाठक अपनी किसी समस्या या घटना-दुर्घटना की तसवीरें-वीडियोज़ भेज सकते है। इससे फोर्थ एस्टेट को थर्ड डाइमेन्शन भी मिला है। फेसबुक पर भी सभी प्रमुख मीडिया ऑर्गेनाइज़ेशन अपने अपने पैज क्रियेट कर के पाठकों से जुड़ रहे हैं। लैकिन लोगों से जुड़ने की इस होड़ में हमारे फैसबुक पैज को लाइक कीजिए और अपनी तसवीर टीवी पर देखिए जैसे बेतुके क्रैज़ भी चल पड़ते हैं।

(Published in Hindi media magazine ‘Media Vimarsh’. You can read more about this trimonthly magazine from here: http://mediavimarshindia.blogspot.in)

Copyright © Jayesh Adhyaru. Please do not copy, reproduce this article without my permission. However, you are free to share this URL or the article with due credits.

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